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आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है: सुप्रीमकोर्ट का महत्व पूर्ण विश्लेषण

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आरक्षण मौलिक अधिकार | supreme court statement on reservation fundamental rights

भारत एक ऐसा लोक तांत्रिक देश है जहा पर सभी को सामान अधिकार और सामान मौके दिए जाते है| भारत में reservation को इसी नजर से देखा जाता है| क्योंकि रिजर्वेशन के द्वारा उन लोगो को सहायता दी जाती है जो पिछड़े है और उनके पास जरूरी रिसोर्स नहीं है| सुप्रीमकोर्ट के द्वारा एक टिपण्णी की गयी है जिसमे उन्होंने कहा है की आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है| आज के इस लेख में हमाप्से इस टिपण्णी के क्या मायने होते है और आरक्षण के सन्दर्भ में भी कुछ इनफार्मेशन को शेयर करेंगे|

रिजर्वेशन क्या है और इसे क्यों दिया गया था?

भारत ही शायद विश्व में एक ऐसा देश जो इस प्रकार की प्रक्रिया को महत्व देता है| आरक्षण(Reservation) के माध्यम से कुछ ऐसे लोग या विद्यार्थी जो काफी पिछड़े तबके से आते है| उनके पास कोई जरूरी साधन सामग्री नहीं है| उनको और उनके पूर्वजो को एक विशेष जाती के होने के कारण प्रताड़ित किया गया हो| जरूरी मूलभूत अधिकारों से दूर रखा गया हो उन्हें अच्छे और दुसरे लोगो के समकक्ष अवसर की प्राप्ति हो इसलिए आरक्षण को भारत में बनाया गया था|

आरक्षण के द्वार किसी भी संस्था या लाभ के स्थानों में कुल क्वोटा में से निश्चित प्रतिशत किसी एक समाज या जाती के लोगो का चयन किया जाता है| जिससे उस जाती या समाज की लोग सेवा में भागीदारी बढे, जाती या समाज शिक्षित बने और उनकी स्थिति सभी लोगो के सामान हो| यही ही महत्वपूर्ण कारण था की रिजर्वेशन दिया गया था|

सरकार किस आधार पर रिजर्वेशन देती है?

किसी भी देश की सरकार एक बंधारण के आधार पर चलती है| भरक का भी एक बंधारण है और सरकार उसी के अनुरूप चलानी चाहीए| भारतीय बंधारण में रिजर्वेशन(आरक्षण) को दिया गया है| आर्टिकल 16(4) के तहत आरक्षण दिया जाता है|

Article 16 : equality of opportunity in matters of public employment

आर्टिकल 16 के द्वारा यह कहा जाता है की भारत में और राज्य में public employment में कही पर भी जाती, समाज, लिंग जैसे भेदभाव नहीं किये जायेंगे| लेकिन उसी का आर्टिकल 16(4) यह कहता है की आर्टिकल 16 कही पर भी आरक्षण के लिए बाध्य नहीं है| मतलब की आर्टिकल 16 का प्रयोग करके आरक्षण का विरोध्ह नहीं किया जायेगा और आर्टिकल 16(4) के तहत आरक्षण देने में आर्टिकल 16 बाध्य नहीं बन सकता|

सुप्रीमकोर्ट ने कहा “आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है

हाल ही में तमिल नाडू राज्य की कुछ पोलिटिकल पार्टी ने एक साथ एक मंच के माध्यम से एक पिटीशन दायर की थी सुप्रीमकोर्ट में जिसमे केंद्र सरकार के द्वारा दी जाने वाली मेडिकल क्षेत्र की सीट में आरक्षण को बढ़ाया जा सके|

किसी भी राज्य में चयन होने वाली कुल मेडिकल सिट में से 15 % केंद्र सरकार के द्वारा भरी जाती है| और उसी 15 % सीट में केंद्र सरकार ओबीसी में आने वाले को 49 प्रतिशत आरक्षण देता है| देश में सिर्फ तमिलनाडू राज्य ही ऐसा है जहा पर 68 प्रतिशत से अधिक सीट आरक्षण के अंतर्गत आती है|

तमिलनाडु राज्य की पोलिटिकल पार्टी के द्वारा यह पिटीशन दायर की है जिसमे उन्होंने केंद्रसरकार के द्वारा 15% सीट में भी 68% आरक्षण लागू हो|

पिटीशन कर्ता के द्वार आरक्षण को आर्टिकल 32 के अंतर्गत रख कर पिटीशन दायर की थी| सुप्रीमकोर्ट के द्वारा इसे नकारते हुए कहा की आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है इस लिए इसे आर्टिकल 32 के अंतर्गत पिटीशन नहीं की जा सकती|

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कुछ विशेष बात

पिछले कुछ समय से एक प्रकार का ट्रेंड चल रहा है की आरक्षण के सन्दर्भ में आने वाले सभी निर्णय आरक्षण के विरुद्ध के ही प्रतीत होते है| बंधारण का विश्लेषण करना सुप्रीमकोर्ट का अधिकार है और वह जो भी कर रहे है वह अपने दायरे में रह कर ही करते होते है लेकिन यह एक ऑब्जरवेशन के साथ कई विशेषग्य का अवलोकन भी है|

जमे आशा है की आपको आरक्षण क्या है क्यों दिया गया है और हाल ही में सुप्रीमकोर्ट के द्वारा आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है ऐसा स्टेटमेंट क्यों दिया गया था| अगर आपको आरक्षण के विषय में कोई भी प्रश्न है तो आप हमें कमेंट करके पूछ सकते है|

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